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शनिवार, 8 मार्च 2014

एक टर्म पढ़ा था वामिटिंग जर्नलिज्म




(Photo-Google)

कैमरे उनके हैं। मैदान उनका है। नजारे उनके हैं, इशारे उनके हैं। मैदान में उमड़ी भीड़ उनकी हैं। शब्द उनके हैं, राजनीति उनकी है। सत्ता से बाहर होने का डर उनका है। सत्ता के सुख को भोगने की महत्वकांक्षा उनकी है। पर ये अवाम शायद उनकी नहीं है...और शायद बहुत कुछ उनका नहीं है।

एक टर्म पढ़ा था वामिटिंग जर्नलिज्म। समाचार चैनलों को भी फ्री में लाइव फीड पाने का चस्का लग गया है। सब कुछ वैसा ही हो रहा है। गलती उनकी नहीं है जो लाइव फीड उपलब्‍ध करा रहे हैं। गलती उनकी है जो उस लाइव फीड को जस का तस लोगों के सामने पेश कर रहे हैं। कोई क्रॉस चेकिंग नहीं हो रही है। आखिर दर्द कौन ले? जनता तो मूर्ख है। आगे भी मूर्ख बनती रहेगी। जरा-जरा सी बात पर भावनाओं में बह जाने वाली इस अवाम के लोग को अक्ल कभी न आए। ऐसी ही दुआ की जाती होगी।

जो राजनीतिक पार्टियां सभी न्यूज टेलीविजन चैनल्स को लाइव अपनी रैलियों की फीड दे रही हैं। क्या, उन लाइव फीड की विश्‍वसनीयता जानने के लिए न्यूज चैनल्स इन रैलियों में अपनी टीम भेजते हैं?

पता नहीं आने वाली पीढ़िया इतिहास पढ़ने में रूचि लेंगी कि नहीं। पर जब भविष्य के लिए जर्नलिज्म का इतिहास लिखा जाएगा। तो आज के युग को जर्नलिज्म का काल युग कहा जाएगा। एक ऐसा समय जब जर्नलिस्ट के काम करने के सारे हक छीन लिए गए हैं। क्योंकि जर्नलिज्म में पैसा कॉरपोरेट घरानों का लगा है। इसलिए जर्नलिस्ट को क्लर्क बनके अपनी सैलरी और किस्तों को भरने की चिंता करते हुए जैसा कॉरपोरेट घराना कहता है, वैसा ही करना होगा। दूसरा रास्ता उसके पास मेनस्ट्रीम जर्नलिज्म को छोड़ देने का है।

जो समय चल रहा है उसमे जब तक पब्लिक फंडिंग नहीं होगी, तब तक पब्लिक के लिए जर्नलिज्म नहीं होगा।

सही भी है...आज के जमाने में करने वाले को कोई नहीं पूछता है और बक-बक करने वाले को सब पूछते हैं।