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मंगलवार, 10 मार्च 2015

कुछ ख्वाब जो अधूरे रह गए (Vinod Mehta)


खुश हूँ कि तुम चले गए 
ऐसी दुनिया से 
जहाँ मांस के लोथड़े भटकते फिरते हैं 
पर दुखी हूँ इस बात पर 
कि औरों की तरह तुमने भी नहीं निभाया वायदा 
कुछ बातें जो पूरी न हो सकी 
कुछ ख्वाब जो अधूरे रह गए 
कुछ कलम रुक सी गई  
कुछ आवाज़ें दब सी गई
कुछ रास्ते कही भटक से गए 
कुछ मिलने वाले जवाब जो सवाल बन कर ही रह गए
तसल्ली देने के लिए ही थोड़ा सा रुक जाते 
आखिर क्या थी जल्दी 
एक अदद उम्मीद भी चली गई 
जैसे चला जाता है कोई साथी 
फिर लौट कर वापस न आने को.
श्र्द्धांजलि Vinod Mehta (1941-2015)

मंगलवार, 29 अप्रैल 2014

जब ट्रेन के सफ़र में हुई अटल बिहारी वाजपेई से मुलाकात


ट्रेन में अकसर नींद नहीं आती है...और जब कई दिन बाद घर की तरह वापसी हो रही हो, तो बिल्कुल भी नहीं। रात में 12 बजे तक तो अपने मोबाइल से ही जूझता रहा। कोशिश खुद से रूठे किसी अपने को मनाने की थी। तब तक वो रूठा हुआ बंदा माना नहीं था। अब क्या करते और क्या न करते, ये बात समझ नहीं आ रही थी।

कोशिश की चलो अब सो जाते हैं पर तभी अचानक कई आवाजें एक साथ निकलने लगी। आवाज़ एक दम यही कह रही थी कि तुम्ही हो-तुम्ही हो! अब ये समझ नहीं पा रहा था कि अचानक मच्छर जो धुन सुनाता है वो अच्छी होती है या फिर लोगों की नाक से निकलने वाला ये म्यूजिक। वैसे तो ये म्यूजिक ट्रेन के किसी डिब्बे में मिल जाएगा। इसका जनरल या फिर फर्स्ट एसी से कोई लेना-देना नहीं है। आप ये मत सोचिएगा कि इस तरह का म्यूजिक सिर्फ जनरल डिब्बे वाले ही निकालते हैं। अरे! भाई उन जनरल डिब्बे वालों को सोने को ही कहा मिलता है वो तो एक दूसरे के ‌ऊपर लद कर ठेलम-ठेल में ही अपने घर तक पहुंच जाते हैं। 

कई लोगों की नाक से निकलने वाला म्यूजिक अब आंखों की दोनों पलकों को चाहकर भी एक दूसरे से नहीं मिलने दे रहा था। दोनों पलकें एक दूसरे से नाराज होती जा रही थी कि आखिर ये म्यूजिक हमें क्यों ये इतना तड़पा रहा है? दोनों पलकें एक दूसरे को चिढ़ा रही थी। तभी टीटी की इंट्री हो गई। टीटी एक-एक करके टिकट पूछता गया और एक-एक करके सबका म्यूजिक प्लेयर बंद होता गया...अब थोड़ी राहत थी। तुरंत टीटी को अपना मोबाइल ‌का एसएमएस दिखाया और करवट बदलकर सारी पलकों को एक-दूसरे से मिला दिया।

नींद लगी ही थी कि अचानक अटल बिहारी वाजपेयी आ गए...बोले और बरखुरदार कैसे हो? अब तो याद ही नहीं करते हो हमें?  हम पहले थोड़ा सकपका गए और फिर बोले अटल जी...आप अचानक यहां कैसे? हमारा इतना पूछना था कि अटल जी थोड़ा नाराज होते हुए बोले, "क्यों हम नहीं आ सकते है तुम्हारे पास? हमारा जिसके पास जाने का मन होगा, हम उसके पास जाएंगे? आज तुम्हारे पास आ गए। अटल जी बोले, " कहां जा रहे हो?"  हमने कहा, " अटल जी, 30 अप्रैल को लखनऊ में वोटिंग है, वोट देने जा रहे हैं। अटल जी बोले, "क्या लोग हमें अब भी याद करते है?" तभी थोड़ा हम सोचने लगे। अटल जी बोले,"क्या सोच रहे हो?" हमने कहा, "पता नहीं, पर एक बात हो है कि पिछले सारे चुनाव तो आपकी पार्टी आप के बूते ही जीती है। कभी आपकी कपड़े दिखाए जाते हैं। तो कभी आपका पोस्टर दिखाया जाता है। उस पोस्टर में आप मुस्कुरा रहे होते हैं और सबसे ज्यादा अच्छे आपके गाल लगते हैं।"

हमने मौका मिलते ही अटल जी से पूछा, " क्या आप सचमुच अब भी ऐसे हॅंस पाते हैं?" अटल जी ने अपना सिर नीचे झुका लिया। आंखे बंद कर ली। थोड़ा सा अपना माथा सिकोड़ते हुए। दो बार अपने सिर को दाएं से बाएं और बाएं से दाएं की तरफ घुमाया। अटल जी ने जैसे ही अपनी आंखें खोली आंसुओं की एक बाढ़ आ गई। कुछ समझ नहीं पाया कि अचानक अटल जी को क्या हो गया है? क्यों रो रहे हैं ये? हमने ऐसा क्या पूछ लिया, क्या होगा अब? पांच मिनट तक बिना कुछ कहे रोते रहे वो। इस दौरान मेरी बिल्कुल भी हिम्मत नहीं हुई कि उनसे कुछ पूछ लूं।

अपनी बांहों को वो अपनी आंखों के पास लाए। जैसे कोई छोटा बच्‍चा अपनी आंख पोछता है, अटल जी ने अपनी आंखे पोछनी शुरू कर दी। उनकी आस्तीनें गीली हो चुकी थी। अपनी बांहों को नीचे करते हुए अटल जी बोले, "जैसे थोड़ी देर पहले तुमकों नींद नहीं आ रही थी। वैसे मुझको रोज नींद नहीं आती है। आंखें बंद करते ही कई बेगुनाह चिल्‍लाते हुए मेरे पास आते हैं, पूछते हैं कि आपने राजधर्म क्यों नहीं निभाया? हमें कब इंसाफ मिलेगा? हजारों लोग है और हजारों सवाल। एक दिन भी चैन की नींद नसीब नहीं हुई है मुझे। बहुत हो चुका अब, अब सब कुछ बर्दाश्त के बाहर जा चुका है। मुझसे से ही सवाल क्यों पूछे जाते हैं? खुद के बचाव में भी कुछ नहीं ‌बोल सकता हूं। बिस्तर पर पड़े-पड़े जिदंगी बीत रही है। अब तो मैं मरना चाहता हूं।"

तभी अटल जी से हमने पूछा," अगर आपके प्रधानमंत्री रहते हुए ऐसा कुछ वीभत्स हुआ है कि जिसे कभी भूला ना जा सके, तो सवाल तो आपके मरने के बाद भी उठते ही रहेंगे। सवाल तो उन सब से पूछे जाएंगें जिनकी सरकारों में ऐसे वीभत्स काम हुए हैं या फिर भविष्य में होगें। सरकार आएंगी, जाएंगी। पर इतिहास तो बदल नहीं जाएगा।

अटल जी बोले, " अब जीने की इच्छा बाकि नहीं रही. कल कहीं मेरे शरीर को लेकर भी राजनीती शुरु हो गई तो क्या करूंगा". हमने कहा, " तो ठीक है आप अपना शरीर दान कर दीजिए। आपके मरने के बाद कम से कम किसी काम तो आ जायेगा। और फिर जब आप अपना शरीर दान कर देंगें। तो न ही फालतू की ज़मीन जाएगी आपकी समाधि बनाने में, न ही हर साल एक दिन आपके नाम पर राजनीति होगी। न ही कोई ट्रस्ट बना के क़ोई घोटाला हो सकेगा। कम से कम मरने के बाद तो कोई आपको परेशान नहीं करेगा"

अटल जी मेरी बात सुनते रहे और अचानक उठ कर चलते चलते दरवाजे के पास पहुँच कर बोले, "जब हमारे जीते जी हमारी नहीं चल रही है तो मरने के बाद हमारा क्या होगा". चलो आज जा रहा हूँ, जिन्दा रहा तो फिर कभी मुलाक़ात होगी"।

हमने उन्हें रोकने लिये हाथ बढ़ाया ही था कि आवाज आई दिल्ली से वाया मुरादाबाद होकर लखनऊ आने वाली दुरंतो एक्सप्रेस प्लेटफॉर्म नंबर एक पर खड़ी है.

सारी पलकें एक दूसरे से अलग हो चुकी थी और सामने खड़े लाल रंग की मोटी शर्ट पहने आदमी ने कहा," भइया सामान उठा ले, 50 रुपए दे देना, बाहर तक पहुंचा देगें।       

बीते हुए लम्हों की कसक साथ तो होगी 
ख़्वाबों में ही हो, चाहे मुलाक़ात तो होगी.

सोमवार, 20 जनवरी 2014

Coverage of Mayawati Sawdhaan rally in National Newspaper of Delhi editions

मायावती की सावधान  रैली की नेशनल मीडिया में खासकर दिल्ली के अख़बारों में कवरेज पर एक रिपोर्ट।

15 जनवरी , 2014 को लखनऊ में बीएसपी पार्टी की  राष्ट्रीय सुप्रीमो मायावती "सावधान" नारे के साथ एक सावधान रैली करती हैं. एक राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में की गई इस रैली के राष्ट्रीय स्तर पर बहुत मायने थे. लेकिन राजधानी दिल्ली में आने वाले अखबारों ने क्या सावधान रैली को उतनी ही अहमियत दी. जितनी उसको मिलनी चाहिए थी तो जवाब न ही नज़र आता है 

अगर इतनी बड़ी रैली किसी अन्य राजनैतिक पार्टी ने की होती तो क्या तब भी ऐसी ही तवज्जो उस पार्टी को दी जाती।

मैं, ये एक दम नहीं कहता हूँ कि इन अखबारों में जिन ख़बरों को पहले पन्ने पर रखा वो बुरा या गलत है.

कुछ दिनों पहले ही रायबरेली में हुई आम आदमी पार्टी के कवि से नेता बने कुमार विश्वास की रैली को "इंडियन एक्सप्रेस" जैसा अखबार पहले पेज पर अपनी खबर बना सकता है. सुनंदा पुष्कर की मौत से पहले शशि थरूर के साथ उनकी अनबन की खबर पहले पन्ने पर आ जाती है.

तो फिर मायावती की ये रैली दिल्ली के अख़बारों में जगह क्यों नहीं बना पाती  है?
 
ये बात बताने की नहीं है कि पहले पेज पर उस खबर को स्थान दिया जाता है जिनका राष्ट्रीय स्तर पर महत्व  होता है. इसलिए पहले पेज पर आई खबर की अपनी इम्पोर्टेंस होती है. क्योकि पहले पेज देखने के बाद कई लोग सीधे-सीधे अपने पसंद के पेज पर स्वीच कर जाते हैं. ऐसे में सही मायनों में देश में कहीँ कुछ ऐसा हुआ जो रीडर्स को जानना भी चाहिए था. वो नहीं जान पाते हैं.

ऐसा इसलिए लिख रहा हूँ  क्योंकि भले ख़बरों का डिजिटल युग आ गया हो. पर फिर भी ख़बरों के इस दौर में आज भी सबसे ज्यादा विश्वसनीय प्रिंट मीडिया ही है. लोग अपने अख़बारों में छपी  ख़बरों के आधार पर लोगों को चुनौती तक दे डालते हैं.

एक नज़र, किसने दी कितनी कवरेज 

1  राजस्थान पत्रिका मायावती की रैली को पेज नंबर -11 पर कवरेज देता है.


2 -दैनिक भास्कर इस रैली को पेज तीन पर कवरेज देता और एजेंसी की खबर लगाता हैं.


 3 - दैनिक जागरण पहले पेज पर खबर को जगह देता है.


4 - नवभारत टाइम्स इस खबर को पेज 16 पर जगह देता है.


5- हिन्दुस्तान पहले पेज पर न दिखने के बराबर जगह देता है और फिर कवरेज पेज 7 पर ही पहुँच जाती है.


6- राष्ट्रीय सहारा  ने पेज 1 पर रैली कवरेज दी है.


7.  अमरउजाला ने पेज-1 न दिखने के बराबर कवरेज दी है और बाकी कि कवरेज पेज 10 पर पहुँच गई है.


Coverage of Mayawati Sawdhaan rally in National Newspaper of Delhi editions

1-The Hindu Page Number -10 Delhi Edition
  BSP will go alone in Lok Sabha election, says Mayawati.



2-The Asian Age-Page1  Bottam right side
   Mayawati: No alliances, will fight LS Alone.


3-The Indian Express
   Maya for Dalit-Musllim unity to keep BJP out.  Page 4



4- The Pioneer- Page 7
    Defeat anti-dalit designs of politicians: Maya   Page-7



5-‘Maya Turns b’day party into opponent basting  Page-8 The Hindustan Times
 

6- Maya indicates she’ll align with secular forces’  Page-15  The Times of India


    It is just a short analysis of Some Major National Newspapers of Delhi Date 16 January, 2014.

Note- I am not associated with any political party. It is just a short review of Newspaper.   

  Post By- Sachin

रविवार, 12 जनवरी 2014

"Humein humari Saasein wapas chahiyein"-Dedh Ishqiya


Humein humari Saasein wapas chahiyein Dedh Ishqiya

Jab Pt.Birju Maharaj, Dr.Bashir Badra, Gulazar, Beguam Akhtar, Naseeruddin shah, Vishal Bhardwaj, Darab Farooqi, Madhuri dixit, jaise naam ek saath jud gaye honge  toh Dedh Ishqiya to banni hi thi.

Ishqiya dekhne walon ko film pasand aayegi. Saath hi Urdu zubaan ko dil mein basa kar baithne walon ka bhi Dedh Ishqiya filmi product aacha entertainment karegi. Urdu na jaanne wale log kahin kahin par boar ho sakte hain. Par Via Bhopal to Lucknow pahuchi Dedh Ishqiya Story likhne wale Darab Farooqi ne badhiya kaam pesh kar aapko entertain karne ki poori koshish ki hai.

Film to aur umda banane  aur aage ka kaam milkar Vishal Bhardwaj (Dialogue,Screenplay aur Music) Director Abhishek Chaubey aur Gulzaar( Lyrics and screenplay) ne kar diya dia hai.

Setu ki cinmetography bahut acchi hai saath hi A. Sreekar Prasad ne badhiya editing ki hai.

Film ke saath ek controversy bhi jud gai hai ki Begum Akhtar ke Humari Atariya waale gaane ka credit Gulzaar ne Begum Akhtar ko nahi diya hai. Isse Pahle bhi Ishqia ke samay bhi Sarweshwar Dayal Saxsena ke poem Ibne-Batuta pahen ke joota par bhi sawal uthe thay. Film industry mein is tarah ke copyright  ke law ko todne ko inspiration kaha jaata hai. Jo ki ek samjahdaar insaan ko hamesha se sochne par mazboor karta hai.

Naseeruddin Shah  (Ifthekhar urf Khalujan) aur Arshad warsi (Razzaakh Hussain  urf Babban) ki jugalbandi film ko aage badhne ka kaam karti hai. Arshad Warsi ki baatein aapko hasne ki wajah de jaati hai aur poora theatre hasne lagta hai.

Lucknow pahuch kar bane nakli nawab khalujaan ka dil  Begum Para par aa jaata hai jinki saashein to pahle se hi udhar par chal rahi hoti hain.

Babban "Pehle bhi dekha hai ishq mein andha bawla hote ... par chutiya pehli baar dekhriya hoon main" aur Khalujaan "Iss baar ishq sacha hai humara bhi aur unkaa bhi" ke beech huye dialogue aapko hasne ka accha mauka denge. Wahi Huma Qureshi (Muniya) ki Chaalaki aapko sochne aur dimaag lagane ke liye bhi kahegi.

Naye nawab ko dudhane ke liye Begum Para ka jalse ko bulana aur phir ek alag nawab ko chunna aapko hairat mein daal dega.

Jaan Mohammad (Vijay Raj) "Humara naam Jaan hai Para Jaan, aapke liye jaan de bhi sakte hain aur le bhi" ko aap film ki asli jaan kah sakte hain. Ya  phir ye kah sakte hain ki nakli nawab ke role ko bahut hi shaandaar tareeke se nibhaya hai. Begum para se baat cheet mein ek baar kahte hain ki ‘Waqt palta bhi to khwahisein thodi palat jayengi’.

Begum Para ka bheek maangte huye kahna ‘Humein humari saashein wapas chahiyein’ Begum ke dard ko bayan karta hai.

Wahin khaalu jaan ka kahna ki Ishq ke saath mukaam hote hain Dilkashi,  Ibadat, Uns, Mohabbat, Akeedat, Junoon.

Ab hum ishq ke saatwein mukaam par hai. Babban ka puchna ki ye ishq ka saatwa muqaam kiya hota hai toh khalu jaan batate hain……..

Kahani Mahmudabaad ki Begum para ki aas-pass ghumte huye ek acche se climax ke saath ‘Teen Ishqiya’  ke intzaar ke liye hume chood jaati hain.

Haan ek baat aur cinema haal mein apni seat se choodne se pahle se Gaana sune aur dekhe bina mat jayiega. Nahi to bahut kuch adhura sa laegga. Rekha Bhardwaj ne accha gaya hai.

“Aaj ja giluari khila dun kimamiyan ki
Laali pe Laali taniq hui jawein”.