सचिन यादव नई दिल्ली
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र(एनसीआर) में फ्लेटों की बिक्री न होने से चावड़ी बाजार के सेनेटरी उद्योग में गिरावट आई है। चावड़ी बाजार के सेनेटरी उद्योग में यह गिरावट लगातार दूसरे वर्ष भी देखी जा रही है।
दिल्ली आयरन एंड मर्चेंटस एसोसिऐशन के सदस्य राकेश गुप्ता ने बताया कि सेनेटरी उद्योग व्यापरियों की खरीदारी पर टिका रहता है। लेकिन एनसीआर इलाकों में खासकर नोएडा और ग्रेटर नोएडा में बने फ्लेटों को खरीदार न मिलने से सेनेटरी के माल की आपूर्ति एकदम ठप है। जब तक बने हुए फ्लेट बिकेगें नहीं, तब तक नए फ्लैट बनेंगे नहीं। नए फ्लेट न बनने से माल की आपूर्ति भी एक दम ठप है।
बाजार में इस समय फुटकर विक्रेता ही आते हैं। आने वाले समय में भी सेनेटरी बाजार में तेजी आने की उम्मीद कम ही है। उन्होंने बताया कि महंगाई के कारण खरीददार कम हैं जिससे सेनेटरी उत्पादों की कीमत २० फीसदी तक बढ़ गई है। उन्होंने बताया कि हमारे उत्पादों को चीन से आए सेनेटरी माल से भी क ड़ा मुकाबला करना पड़ रहा है। अधिकांश बड़े व्यापारी जिन्हें बल्क में माल खरीदना होता है। अब चीनी उत्पादों की बुकिंग भी करवा रहे हैं।
वहीं एसोसिऐशन के अध्यक्ष सत्येन्द्र जैन ने बताया कि मार्के ट में इस समय गिरावट देखी जा सकती है। उन्होंने कहा कि दिल्ली सरकार ने वैट की दर भी सेनेटरी उत्पादों पर ४ फीसदी से बढ़ाकर १२.५ फीसदी के स्तर पर कर दी है। मार्केट में खरीदारों ने सेनेटरी उत्पादों के बढ़ते दामों से कदम पीछे खींच लिए हैं।
हौज काजी में पिछले कई सालों से सेनेटरी उत्पादों का व्यापार कर रहे मो.हुसैन कहते हैं कि बाजार में सेनेटरी उत्पादों की मांग बिल्कुल कम है। कम मांग के कारण हमें अपने खर्चों में कटौती भी करनी पड़ रही है। इसका असर बाजार में काम करने वाले मजदूरों की तनख्वाह पर भी पड़ता है।
इस को क्या कह सकते हैं जिंदगी में दोस्तों का साथ होना कितना जरूरी होता है. हम सभी अपने काम में बिजी होने के कारण अपने दोस्तों को समय नहीं दे पाते हैं. जिन्होंने हमारे कठिन मोड़ पर हमारा साथ दिया था उन सबको भूल जाते हैं. जिंदगी की उड़ान में दोस्त उन पंखों सरीखे होते हैं जिनके बिना कोई भी उड़ान पूरी नहीं की जा सकती है. शब्द कम पड़ सकते हैं लेकिन उस दोस्ती को किसी भी चीज़ से तौला नहीं जा सकता है...
बुधवार, 4 अगस्त 2010
सोमवार, 7 जून 2010
भोपाल गैस त्राशादी
विश्व की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी 'भोपाल गैस कांड के घटित होने के तकरीबन २६ साल बाद आठ दोषियों को सजा सुनाई गई है। इस त्रासदी का घटनाक्रम कुछ इस तरह से है :
३ दिसंबर,१९८४- यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड के भोपाल स्थित पेस्टीसाइड प्लांट से मिथाइल आइसोसाइनेट नामक जहरीली गैस के रिसाव के कारण लगभग १५ हजार लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी और कम से कम पांच लाख लोग इस गैस की चपेट में आए। साथ ही लाखों लोग बीमार पड़ गए। उनकी आने वाली पीढिय़ां भी गैस के हानिकारक असर से बच नहीं पाईं।
४ दिसंबर,१९८४- यूनियन कार्बाइड के चेयरमैन वारेन एंडरसन समेत नौ लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार किया। लेकिन वारेन एंडरसन को २ हजार डॉलर का जुर्माना भरने पर जमानत दे दी गई। वारेन एंडरसन ने जमानत लेते समय भारत लौटने का वादा किया था। इससे जुड़े फौजदारी मामले में १०वां अभियुक्त यूनियन कार्बाइड को बनाया गया, जिस पर सामूहिक नरसंहार का आरोप लगाया गया।
फरवरी, १९८५- भारत सरकार ने यूनियन कार्बाइड से ३.३ अरब डॉलर का मुआवजा पाने के लिए एक अमेरिकी अदालत में दावा ठोंका।
१९८६- अमेरिका जिला अदालत के जज ने भोपाल गैस त्रासदी के सारे मामलों को भारत स्थानांतरित कर दिया।
दिसंबर १९८७- सीबीआई ने वारेन एंडरसन और यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन (यूएसए), यूनियन कार्बाइड (ईस्टर्न) हांगकांग और यूसीआईएल के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। एंडरसन और यूसीसी को सामूहिक नरसंहार के मामले में सम्मन भी भेजा गया।
फरवरी,१९८९- भोपाल के सीजेएम ने सम्मन की बार-बार अवेहलना करने के कारण वारेन एंडरसन के खिलाफ गैर जमानती वांरट जारी किया।
फरवरी, १९८९- यूनियन कार्बाइड द्वारा ४७ करोड़ डालर की क्षतिपूर्ति भरने संबंधी सौदा भारत सरकार और यूनियन कार्बाइड के बीच अदालत के बाहर हुआ।
फरवरी-मार्च,१९८९- इस समझौते को गैर वाजिब करते देते हुए भारी जनविरोध हुआ। इसके साथ ही भोपाल गैस पीडि़त महिला उद्योग संगठन और भोपाल गैस पीडि़त संघर्ष सहयोग समिति समेत कई संगठनों ने इस समझौते के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में ढेर सारी याचिकाएं दाखिल कीं।
१९९२- सरकार ने ४७ करोड़ डालर के मुआवजे का एक हिस्सा भोपाल गैस पीडि़तों के बीच वितरित किया।
फरवरी,१९९२- अदालत ने कोर्ट के सम्मनों की अवेहलना करने के कारण वारेन एंडरसन को भगोड़ा घोषित किया।
नवंबर,१९९४- अदालत में कई याचिकाएं दाखिल होने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने यूनियन कार्बाइड को यूसीआईएल में अपना हिस्सा क ोलकाता स्थित मैकलियॉड रसेल (इंडिया) लिमिटेड को बेचने की अनुमति दे दी।
सितंबर,१९९६- सुप्रीम कोर्ट ने यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड (यूसीआईएल) के भारतीय अधिकारियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों को थोड़ा कम कर दिया। नरसंहार के लिए मुख्यत: यूनियन कार्बाइड कॉर्पाेरेशन (यूसीसी) को जिम्मेदार माने जाने के कारण ही ये आरोप कम किए गए। यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड की बहुमत हिस्स्ेदारी उस समय यूसीसी के पास ही थी।
अगस्त,१९९९- यूनियन कार्बाइड ने अमेरिका की डो केमिकल्स में विलय की घोषणा की।
नवंबर,१९९९- अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संस्था ग्रीनपीस ने यूनियन कार्बाइड फैक्टरी के आसपास जांच में पाया कि वहां १२ वाष्पशील आर्गेनिक केमिकल्स और मरकरी की मात्रा अपेक्षा से ६० लाख गुना तक अधिक है।
नवंबर,१९९९- यूनियन कार्बाइड और इसके पूर्व सीईओ के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार उल्लघंन, पर्यावरण कानून, और अंतर्राष्ट्रीय क्रिमिनल लॉ के अंतर्गत भोपाल गैस त्रासदी के भुक्तभोगी व बचे हुए लोगों ने न्यूयार्क के फेडरल कोर्ट पर याचिका दाखिल की7
फरवरी,२००१- यूनियन कार्बाइड ने भारत में यूसीआईएल की देनदारियों की जिम्मेदारी लेने से मना कर दिया।
जून,२००२- भोपाल गैस त्रासदी के भुक्तभोगियों ने भारत सरकार के खिलाफ तब प्रदर्शन किया जब उन्हें पता चला कि सरकार एंडरसन के खिलाफ लगे आरोपों को वापस लेने पर विचार कर रही है।
अगस्त,२००२- भारतीय अदालत ने एंडरसन के खिलाफ लगाए गए सामूहिक नरसंहार के आरोपों को बरकरार रखा। भारतीय अदालत ने एंडरसन के प्रत्यर्पण की मांग की ताकि उसके खिलाफ सुनवाई हो सके। इस बीच, एक ब्रिटिश अखबार ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि एंडरसन अमेरिका में ही मौजूद है।
अक्टूबर,२००२-यूसीआईएल फैक्टरी को साफ करने को लेकर एक बार फिर से विरोध प्रदर्शन किया गया। सामजिक कार्यकताओं का कहना था कि फैक्टरी में अभी भी हजारों टन जहरीला पदार्थ है।
मई, २००३- भारत ने अमेरिका से एंडरसन के प्रत्यर्पण के लिए निवेदन किया।
मार्च,२००४- अमेरिका अदालत ने कहा कि वह डो केमिकल्स को भारत की जमीन से जहरीला केमिकल साफ करने के निर्देश दे सकती है अगर इसके लिए भारत सरकार नो आब्जेक्शन सर्टिफिकेट दे। इसके बाद भारत सरकार ने सर्टिफि केट अमेरिका भेजा।
जून,२००४-अमेरिका ने एंडरसन के भारत प्रत्यर्पण को ये कहकर ठुकरा दिया कि द्विपक्षीय प्रत्यर्पण संधि के अनुसार एंडरसन का प्रत्यर्पण संभव नही है।
१९,जुलाई २००४- भारत की उच्चतम न्यायालय ने सेंट्रल बैंक को आदेश दिया कि सन् १९९२ से जमा ४७ करोड़ डालर के आधार पर १५ अरब रुपये का लोगों को मुआवजा वितरित करें।
२५ अक्टूबर,२००४- भोपाल गैस त्रासदी के पीडि़तों ने सरकार के मुआवजा न बांटने को लेकर विरोध किया।
२६ अक्टूबर,२००४- सुप्रीम कोर्ट ने ४७ करोड़ डालर का मुआवजा १५ नंवबर तक बांटे जाने की अंतिम तारीख घोषित की।
७ जून, २०१०- कोर्ट ने यूनियन कार्बाइड के चेयरमैन केशब महिंद्रा समेत आठ लोगों को भोपाल गैस त्रासदी के लिए दोषी ठहराया ।
अनुवाद- सचिन यादव सन्दर्भ पीटीआई
३ दिसंबर,१९८४- यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड के भोपाल स्थित पेस्टीसाइड प्लांट से मिथाइल आइसोसाइनेट नामक जहरीली गैस के रिसाव के कारण लगभग १५ हजार लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी और कम से कम पांच लाख लोग इस गैस की चपेट में आए। साथ ही लाखों लोग बीमार पड़ गए। उनकी आने वाली पीढिय़ां भी गैस के हानिकारक असर से बच नहीं पाईं।
४ दिसंबर,१९८४- यूनियन कार्बाइड के चेयरमैन वारेन एंडरसन समेत नौ लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार किया। लेकिन वारेन एंडरसन को २ हजार डॉलर का जुर्माना भरने पर जमानत दे दी गई। वारेन एंडरसन ने जमानत लेते समय भारत लौटने का वादा किया था। इससे जुड़े फौजदारी मामले में १०वां अभियुक्त यूनियन कार्बाइड को बनाया गया, जिस पर सामूहिक नरसंहार का आरोप लगाया गया।
फरवरी, १९८५- भारत सरकार ने यूनियन कार्बाइड से ३.३ अरब डॉलर का मुआवजा पाने के लिए एक अमेरिकी अदालत में दावा ठोंका।
१९८६- अमेरिका जिला अदालत के जज ने भोपाल गैस त्रासदी के सारे मामलों को भारत स्थानांतरित कर दिया।
दिसंबर १९८७- सीबीआई ने वारेन एंडरसन और यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन (यूएसए), यूनियन कार्बाइड (ईस्टर्न) हांगकांग और यूसीआईएल के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। एंडरसन और यूसीसी को सामूहिक नरसंहार के मामले में सम्मन भी भेजा गया।
फरवरी,१९८९- भोपाल के सीजेएम ने सम्मन की बार-बार अवेहलना करने के कारण वारेन एंडरसन के खिलाफ गैर जमानती वांरट जारी किया।
फरवरी, १९८९- यूनियन कार्बाइड द्वारा ४७ करोड़ डालर की क्षतिपूर्ति भरने संबंधी सौदा भारत सरकार और यूनियन कार्बाइड के बीच अदालत के बाहर हुआ।
फरवरी-मार्च,१९८९- इस समझौते को गैर वाजिब करते देते हुए भारी जनविरोध हुआ। इसके साथ ही भोपाल गैस पीडि़त महिला उद्योग संगठन और भोपाल गैस पीडि़त संघर्ष सहयोग समिति समेत कई संगठनों ने इस समझौते के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में ढेर सारी याचिकाएं दाखिल कीं।
१९९२- सरकार ने ४७ करोड़ डालर के मुआवजे का एक हिस्सा भोपाल गैस पीडि़तों के बीच वितरित किया।
फरवरी,१९९२- अदालत ने कोर्ट के सम्मनों की अवेहलना करने के कारण वारेन एंडरसन को भगोड़ा घोषित किया।
नवंबर,१९९४- अदालत में कई याचिकाएं दाखिल होने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने यूनियन कार्बाइड को यूसीआईएल में अपना हिस्सा क ोलकाता स्थित मैकलियॉड रसेल (इंडिया) लिमिटेड को बेचने की अनुमति दे दी।
सितंबर,१९९६- सुप्रीम कोर्ट ने यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड (यूसीआईएल) के भारतीय अधिकारियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों को थोड़ा कम कर दिया। नरसंहार के लिए मुख्यत: यूनियन कार्बाइड कॉर्पाेरेशन (यूसीसी) को जिम्मेदार माने जाने के कारण ही ये आरोप कम किए गए। यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड की बहुमत हिस्स्ेदारी उस समय यूसीसी के पास ही थी।
अगस्त,१९९९- यूनियन कार्बाइड ने अमेरिका की डो केमिकल्स में विलय की घोषणा की।
नवंबर,१९९९- अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संस्था ग्रीनपीस ने यूनियन कार्बाइड फैक्टरी के आसपास जांच में पाया कि वहां १२ वाष्पशील आर्गेनिक केमिकल्स और मरकरी की मात्रा अपेक्षा से ६० लाख गुना तक अधिक है।
नवंबर,१९९९- यूनियन कार्बाइड और इसके पूर्व सीईओ के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार उल्लघंन, पर्यावरण कानून, और अंतर्राष्ट्रीय क्रिमिनल लॉ के अंतर्गत भोपाल गैस त्रासदी के भुक्तभोगी व बचे हुए लोगों ने न्यूयार्क के फेडरल कोर्ट पर याचिका दाखिल की7
फरवरी,२००१- यूनियन कार्बाइड ने भारत में यूसीआईएल की देनदारियों की जिम्मेदारी लेने से मना कर दिया।
जून,२००२- भोपाल गैस त्रासदी के भुक्तभोगियों ने भारत सरकार के खिलाफ तब प्रदर्शन किया जब उन्हें पता चला कि सरकार एंडरसन के खिलाफ लगे आरोपों को वापस लेने पर विचार कर रही है।
अगस्त,२००२- भारतीय अदालत ने एंडरसन के खिलाफ लगाए गए सामूहिक नरसंहार के आरोपों को बरकरार रखा। भारतीय अदालत ने एंडरसन के प्रत्यर्पण की मांग की ताकि उसके खिलाफ सुनवाई हो सके। इस बीच, एक ब्रिटिश अखबार ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि एंडरसन अमेरिका में ही मौजूद है।
अक्टूबर,२००२-यूसीआईएल फैक्टरी को साफ करने को लेकर एक बार फिर से विरोध प्रदर्शन किया गया। सामजिक कार्यकताओं का कहना था कि फैक्टरी में अभी भी हजारों टन जहरीला पदार्थ है।
मई, २००३- भारत ने अमेरिका से एंडरसन के प्रत्यर्पण के लिए निवेदन किया।
मार्च,२००४- अमेरिका अदालत ने कहा कि वह डो केमिकल्स को भारत की जमीन से जहरीला केमिकल साफ करने के निर्देश दे सकती है अगर इसके लिए भारत सरकार नो आब्जेक्शन सर्टिफिकेट दे। इसके बाद भारत सरकार ने सर्टिफि केट अमेरिका भेजा।
जून,२००४-अमेरिका ने एंडरसन के भारत प्रत्यर्पण को ये कहकर ठुकरा दिया कि द्विपक्षीय प्रत्यर्पण संधि के अनुसार एंडरसन का प्रत्यर्पण संभव नही है।
१९,जुलाई २००४- भारत की उच्चतम न्यायालय ने सेंट्रल बैंक को आदेश दिया कि सन् १९९२ से जमा ४७ करोड़ डालर के आधार पर १५ अरब रुपये का लोगों को मुआवजा वितरित करें।
२५ अक्टूबर,२००४- भोपाल गैस त्रासदी के पीडि़तों ने सरकार के मुआवजा न बांटने को लेकर विरोध किया।
२६ अक्टूबर,२००४- सुप्रीम कोर्ट ने ४७ करोड़ डालर का मुआवजा १५ नंवबर तक बांटे जाने की अंतिम तारीख घोषित की।
७ जून, २०१०- कोर्ट ने यूनियन कार्बाइड के चेयरमैन केशब महिंद्रा समेत आठ लोगों को भोपाल गैस त्रासदी के लिए दोषी ठहराया ।
अनुवाद- सचिन यादव सन्दर्भ पीटीआई
मंगलवार, 25 मई 2010
कागज की खपत में बढ़ोतरी
सचिन यादव नई दिल्लीचावड़ी बाजार स्थित एशिया का सबसे बड़ा कागज बाजार आर्थिक मंदी के खराब दौर से उबर आया है। आजकल बाजार में २० फीसदी से अधिक की तेजी दिखाई पड़ रही है जोकि आने वाले ५ से ६ महीनों तक लगातार जारी रहने की संभावना है। साथ की रिकवर्ड पेपर के कारोबार में भी तेजी आई है। इस समय अरब देशों के साथ-साथ पड़ोसी देश श्रीलंका को भी कागज का निर्यात किया जा रहा है।पेपर मर्चेंट एसोसिएशन के महासचिव पदम चंद जैन कहते हैं कि पेपर के कारोबार में तेजी का एक प्रमुख कारण ग्लोबल वार्मिंग भी है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण लोगों ने पॉलीथीन को प्रयोग करना कम किया है। आज लोगों में जागरूकता के कारण इको फे्रंडली बैग का प्रयोग करने वालों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है। इसलिए व्यापरियों ने भी इको फें्र डली बैग के उत्पादन को बढ़ाया है।पदम चंद कहते हैं कि २००८ में भारत में ९ मिलियन टन कागज का उत्पादन हुआ था जबकि उसी वर्ष १०।२ मिलियन टन कागज का उपभोग लोगों की जरूरतों को पूरा करने में खर्च हो गया ,जिसके लिए बाकी कागज आयात किया गया था। भारत में पेपर का उपभोग बढ़ता जा रहा है। २००८ के ९ मिलियन टन से बढ़कर २०२० में कागज का उत्पादन १८.५ मिलियन टन पहुंच जाने की संभावना है।सबसे अधिक पेपर मैगजीन, पोस्टर और कलेण्डर बनाने में खर्च होता है। भारत में पैकजिग में ४.५ मिलियन टन कागज, न्यूज प्रिंट में १.७ मिलियन टन , प्रिटिंग एंड राइटिंग में ३.६ मिलियन टन कागज की खपत हो जाती है। जोकि लगातार बढ़ती ही जा रही है। उन्होंने साफ किया बाजार में महंगाई है फिर भी कागज की खपत लगातार बढ़ती जा रही है।रिकवर्ड पेपर के विषय में पदम चंद कहते हैं कि भारत में सबसे अधिक रिकवर्ड पेपर का आयात अमेरिका से किया जाता है। भारत अमेरिका से ३४ प्रतिशत से अधिक रिकवर्ड कागज का आयात करता है। जबकि ६६ फीसदी से अधिक रिकवर्ड कागज यूएई, यूके, और यूरोप से आयात किया जाता है।पदम चंद जैन कहते है कि चावड़ी बाजार पेपर का मुख्यत वितरण केन्द्र है। यहां पर पेपर टेड्रर्स की १३५० से अधिक दुकानें हैं और सालाना करीब २५०० करोड़ से अधिक का कारोबार हो जाता है। गौरतलब है कि एशिया की सबसे बड़ी कागज वितरण बाजार से प्रत्यक्ष रूप से १० हजार से भी अधिक परिवार जुड़े हुए हैं।
धंधा है पर मंदा है ये
सचिन यादव नई दिल्ली
चावड़ी बाजार स्थित कागज के व्यापरियों में जहां खुशी का माहौल है वहीं दूसरी ओर ग्रीटिंग कार्ड का व्यापार करने वाले व्यापरियों का धंधा काफी मंदा चल रहा है। नए टेक्रोलाजी और मोबाइल क्रांति ने पूरी तरह से लोगों को अपना दिवाना बना लिया है जिससे ग्रीटिंग कार्ड की तरफ किसी का ध्यान भी नहीं है। ग्रीटिंग कार्ड का कारोबार करने वाले रंजन कहते हैं कि अब कौन कार्ड खरीदना चाहता है, लोग अपनी उंगलियों को मोबाइल या कंप्यूटर में खटपटा कर और थोड़ा सा कष्ट देकर कुछ ही समय में लोग अपनों से बातें कर रहे हैं। आखिर कौन ऐसे में धूप में बाजार आएगा, कौन ग्रीटिंग कार्ड का पोस्ट करने के झंझट में पड़ेगा। व्यापारी लक्ष्मी जैन कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि लोग ग्रीटिंग कार्ड खरीद नहीं रहे हैं लेकिन आजकल लोगों को ब्रांड पंसद आता है। इसलिए लोग ग्रीटिंग कार्ड की खरीदारी कर भी रहे हैं तो पहले उसकी कंपनी देख रहे हैं। व्यापारी सुंदर लाल कहते हैं कि ग्रीटिंग कार्ड के कारोबार में इतनी गिरावट है कि पिछले कई सालों से ही कार्डों के उत्पादन को कम कर दिया गया है।मॉडल टाउन के निवासी तरुण चौहान कहते हैं कि कार्ड लाओ, फिर चिपकाओ, पोस्ट आफिस जाओ, लाइन लगाओ और घंटों के बाद एक कार्ड पोस्ट करने के झंझट में अब कौन पडऩा चाहेगा। जब मोबाइल और ईमेल है तो कौन इस मुसीबत में पड़े। मीडियाकर्मी सिम्पल कहती हैं कि हमारा इतना बड़ा नेटवर्क है और सभी को कार्ड भेजना संभव नही है। जबकि मोबाइल और ईमेल से एक बार में एक निश्चित संख्या में लोगों को अपनी कोई भी बात पहुचाई जा सकती है। आप पैसे के साथ-साथ अपना बेशकीमती समय भी बचा सकते हैं।
चावड़ी बाजार स्थित कागज के व्यापरियों में जहां खुशी का माहौल है वहीं दूसरी ओर ग्रीटिंग कार्ड का व्यापार करने वाले व्यापरियों का धंधा काफी मंदा चल रहा है। नए टेक्रोलाजी और मोबाइल क्रांति ने पूरी तरह से लोगों को अपना दिवाना बना लिया है जिससे ग्रीटिंग कार्ड की तरफ किसी का ध्यान भी नहीं है। ग्रीटिंग कार्ड का कारोबार करने वाले रंजन कहते हैं कि अब कौन कार्ड खरीदना चाहता है, लोग अपनी उंगलियों को मोबाइल या कंप्यूटर में खटपटा कर और थोड़ा सा कष्ट देकर कुछ ही समय में लोग अपनों से बातें कर रहे हैं। आखिर कौन ऐसे में धूप में बाजार आएगा, कौन ग्रीटिंग कार्ड का पोस्ट करने के झंझट में पड़ेगा। व्यापारी लक्ष्मी जैन कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि लोग ग्रीटिंग कार्ड खरीद नहीं रहे हैं लेकिन आजकल लोगों को ब्रांड पंसद आता है। इसलिए लोग ग्रीटिंग कार्ड की खरीदारी कर भी रहे हैं तो पहले उसकी कंपनी देख रहे हैं। व्यापारी सुंदर लाल कहते हैं कि ग्रीटिंग कार्ड के कारोबार में इतनी गिरावट है कि पिछले कई सालों से ही कार्डों के उत्पादन को कम कर दिया गया है।मॉडल टाउन के निवासी तरुण चौहान कहते हैं कि कार्ड लाओ, फिर चिपकाओ, पोस्ट आफिस जाओ, लाइन लगाओ और घंटों के बाद एक कार्ड पोस्ट करने के झंझट में अब कौन पडऩा चाहेगा। जब मोबाइल और ईमेल है तो कौन इस मुसीबत में पड़े। मीडियाकर्मी सिम्पल कहती हैं कि हमारा इतना बड़ा नेटवर्क है और सभी को कार्ड भेजना संभव नही है। जबकि मोबाइल और ईमेल से एक बार में एक निश्चित संख्या में लोगों को अपनी कोई भी बात पहुचाई जा सकती है। आप पैसे के साथ-साथ अपना बेशकीमती समय भी बचा सकते हैं।
शनिवार, 22 मई 2010
डेनिम की बढती मांग
सचिन यादव बिजनेस भास्कर नई दिल्लीडेनिम की मांग से टैंक रोड स्थित डेनिम का थोक कपड़ा बाजार गर्मी के मौसम गुलजार है। ग्राहकों के लगातार बढ़ती खरीदारी करने से डेनिम के व्यापरियों में भी काफी उत्साह है। युवाओं का फैशन को लेकर किए जाने वाले नए प्रयोग और डेनिम के प्रति बढ़ती चाहत ने डेनिम के कारोबार में इस मौसम में भी जान फंूक दी है। भारत में ९० फीसदी से अधिक डेनिम की खरीदारी अंसगठित क्षेत्र से होती हैं और ब्रांडेड कंपनियों को ये सेक्टर काफी अधिक टक्कर दे रहा है। लोगों में टैंक रोड स्थित मार्केट के प्रति लगाव बढऩे का एक कारण सस्ते दामों पर अच्छी और टिकाऊ जींस का मिलना है। क्योंकि २५० से ३०० रूपये में अच्छी जींस मिल जाती है। शादीपुर से जींस की खरीदारी करनें आए आईटी प्रोफेशनल रवि कुमार बताते हैं कि इतने कम दामों में तो आज पैंट का कपड़ा भी नहीं मिलता है जबकि कई दूसरी डेनिम की जींस देने वाली कंपनियां सिर्फ टैग लगाकर ऐसे ही डेनिम जींस प्रति पीस हजार या उससे भी अधिक के दामों पर बैच रही हैं। गर्मी की छुट्टी में अपनी पॉकेट मनी बचाकर खरीदारी करनें आई बारहवीं की छात्रा मीनाक्षी इस मार्केट को अपनें बजट के हिसाब से फिट मानती हैं और कहती हैं कि यहां अब लड़कियों के लिए डेनिम की जींस की वैरायटी बहुत अधिक मात्रा में आ गई है। अब अपनें बजट के हिसाब और अपनी पंसद की जींस खरीदने में मुझे कोई दिक्कत नहीं होती है।डेनिम व्यवसायी अंकुल भल्ला बताते हैं कि पिछले साल तक गर्मी में यहां ग्राहकों की काफी कमी थी और हम लोग जल्द से जल्द शादी-ब्याह और जाड़े के मौसम का इंतजार करते थे। लेकिन इस बार उम्मीद के उलट सारे परिणाम देखने को मिल रहे हैं। साथ ही इस गर्मी के साथ इस महंगाई के मौसम भी लोग खरीदारी करने आ रहे हैं। डेनिम का एक्सपोर्ट और इम्पोर्ट का कारोबार करने वाले अजीत सिंह दूसरे राज्यों से व्यापरियों के इस मौसम में आने से काफी खुश हैं। अजीत कहते हैं कि गर्मी के मौसम में मुख्यत लोग व्यापार के लिए नहीं आते हैं। लेकिन इस बार व्यापरियों के आने से सभी व्यापरियों में काफी उत्साह है।
सोमवार, 12 अप्रैल 2010
ये आग कब ठंडी पड़ेगी
हर साल हर मौसम के कई रंग देखने को मिलते हैं.पर इस साल दिल्ली में कुछ नया ही रंग देखने को मिल रहा है. और ये रंग है आग की तेज लपटों का थोडा सा नीला और थोडा सा लाल. इस आग के रंगों में बहुतों की रोजी रोटी जल रही है. कई लोगों के आशियाँ उजड़ रहे हैं. आखिर ये आग अपना रंग क्यों दिखा रही है. २ अप्रैल को पूर्व केन्द्रीय मंत्री रामबिलास पासवान के घर आग लग जाती और गाड़ियाँ खड़े खड़े खाक हो जाती हैं. उसी दिन इन कम टैक्स विभाग में आग लगती है और कई ज़रूरी कागज आग की गर्मी मेंभस्म हो जाते हैं. ये आग अभी ठंडी होने का नाम नही लेती है और फिर ८ अप्रैल को गाजीपुर फलाई ओवर के पास गरीबों की १००० झुग्गियों को निशाना बना लेती है. आग अब हर तरफ दहक रही है और हर किसी को अपनी चपेट में लेने के लिए तैयार है. उसका अगला निशाना बनती हैं नेहरु प्लेस में खड़ी दो बसें. जिनमे अपने आप आग लग जाती है, वही दूसरी और एक आदमी की कार उसकी आखों के सामने जल जाती है. और वो कुछ नही करता, भगवन का शुक्रिया अदा करता है आग तब लगी जब वो कार में नही बैठा था. आग थापर हाउस में भी पहुँचती है. और अब आगे बढ़ते हुए. 9 अप्रैल को तुगलकाबाद के कंटेनर डिपो में करोडो रुपये का नुक्सान कर देती हैं. इसके बाद बारी थी उत्तर पाश्चिम दिल्ली की प्लास्टिक इस्क्रेप मार्केट में आग लग जाती है. ये आग बुझने का नाम नही ले रही. और लोगों की जुबान पर इतना ही भर है की ये आग कब ठंडी पड़ेगी
गुरुवार, 18 मार्च 2010
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